Tuesday, December 13, 2011

जीना इसी का नाम हैं



मौत के काली अंधी हाथों ने जब
चुरालिया मेरे जीवन का सपना 
बेबस लाचार तनहा  खड़ी थी मैं 
ज़िन्दगी की चौराहों पर ||

एक पल में जैसे मैंने सब
हैं खो दिए; जीवन के रंगीन 
सपने हो गए बेरंग; जीने की 
आस ही दिल से छूट सी गयी...

भटकती रही मैं मन की 
गलियों में, ढूँढ़ते रहे जवाब,
हज़ारों सवाल थे जगे हुए -
मेरे ही साथ ऐसे क्यों हुए ???

बेसहारा, बेबस घूम रही थी मैं,
जब अचानक दिखी एक तिनका
रौशनी की; उसके सहारे चली मैं;
और मिल गयी उजाले की सौबत...

देखा तो दिल के अन्दर ही से
मेरे, निकल रहे थे वे किरणों की 
तरंग; जैसे मुझ से वह कह रही  हैं -
आगे बढ़ना हैं तुम्हे जीवन की ओर!