मौत के काली अंधी हाथों ने जब
चुरालिया मेरे जीवन का सपना
बेबस लाचार तनहा खड़ी थी मैं
ज़िन्दगी की चौराहों पर ||
एक पल में जैसे मैंने सब
हैं खो दिए; जीवन के रंगीन
सपने हो गए बेरंग; जीने की
आस ही दिल से छूट सी गयी...
भटकती रही मैं मन की
गलियों में, ढूँढ़ते रहे जवाब,
हज़ारों सवाल थे जगे हुए -
मेरे ही साथ ऐसे क्यों हुए ???
बेसहारा, बेबस घूम रही थी मैं,
जब अचानक दिखी एक तिनका
रौशनी की; उसके सहारे चली मैं;
और मिल गयी उजाले की सौबत...
देखा तो दिल के अन्दर ही से
मेरे, निकल रहे थे वे किरणों की
तरंग; जैसे मुझ से वह कह रही हैं -
आगे बढ़ना हैं तुम्हे जीवन की ओर!