Sunday, November 20, 2011

कब आओगे...

काली रात के आँचल में 
तन्हाई के चादर ओढ़ के
तुम्हारे यादों मेंबेकरार-
लम्हों को हम गुज़ारा करते हैं |


कही दूर से गूँज रही हैं किसी
बुल बुल के एकाकी नगमे;
पीपल के डालों पर से कई 
जुगनुओं ने आँख मिचोली खेली...

अम्बर के आँगन में खिलते 
तारों को गिनगिन करके
बहारों में लहराते हवाओं के
खुशुबुओं को महसूस करके,


काली अँधेरी यह रात भी
ऐसे ही हम गुजारेंगे;
दिल में बस यही आस लगी
कि - तुम कब आओगे??