बचपन के दिन...
जाने कहाँ गए वो दिन
बचपन के न्यारे,
निडर होके जब हम चले थे
हर राह पर;
कितने रंगीन थे वो दिन -
बचपन के हमारे
जब मन में थे मेरे, केवल
खुशियों के लहर!
बागों में नाचती तितलियों
के पीछे भागना,
छम छम कर बरसते
बारिश में भीगना;
बेफिक्र सोना
फूलों और कलियों से दिन-
रात बाते छेड़ना;
तालाब के ठन्डे पानी में
गोते लगाना,
हरियाली खेतों में लहराते
पवन को छूना;
सुबहों में ओस की बूंदों के
मिठास चखना,
रातों को छत पर लेट आकाश
के तारे गिनना;
न जाने कहाँ गुम होगए
वो बहारें बेमिसाल
जाने कहाँ खो दिए मेने
बचपन के वो दिन सुनहरे!!!

Comments
♥
आदरणीया nishdil जी
सस्नेहाभिवादन !
मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई …सुदूर दक्षिण केरल में आपको हिंदी भाषा में काव्य सृजन करते हुए देख कर …
न जाने कहां गुम हो गए
वो बहारें बेमिसाल
जाने कहां खो दिए मैंने
बचपन के वो दिन सुनहरे!!!
बचपन की यादों के सहारे हम सब जीवन भर अपने आपको बहलाते रहते हैं … मन को छूने वाले भाव हैं आपकी कविता में … बधाई और शुभकामनाएं !
आपकी चित्रकारी ने भी प्रभावित किया … आभार !
बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार
आपकी कविता ने मेरे दिल को छू लिया और मेरे बचपन की याद दिला दी |बहोत-बहोत बधाइयाँ |