जाने कहाँ गए वो दिन
बचपन के न्यारे,
निडर होके जब हम चले थे
हर राह पर;
कितने रंगीन थे वो दिन -
बचपन के हमारे
जब मन में थे मेरे, केवल
खुशियों के लहर!
बागों में नाचती तितलियों
के पीछे भागना,
छम छम कर बरसते
बारिश में भीगना;
बेफिक्र सोना
फूलों और कलियों से दिन-
रात बाते छेड़ना;
तालाब के ठन्डे पानी में
गोते लगाना,
हरियाली खेतों में लहराते
पवन को छूना;
सुबहों में ओस की बूंदों के
मिठास चखना,
रातों को छत पर लेट आकाश
के तारे गिनना;
न जाने कहाँ गुम होगए
वो बहारें बेमिसाल
जाने कहाँ खो दिए मेने
बचपन के वो दिन सुनहरे!!!
